विवरण
यह प्रवचन जैन साधु और श्रावकों के आचरण में पाए जाने वाले भेदों के कारणों पर विचार करता है, जबकि मोक्ष का लक्ष्य सभी के लिए समान है। इसमें बताया गया है कि मतभेद ज्ञान में नहीं, बल्कि कर्मकांड, परंपरा और व्याख्याओं में उत्पन्न होते हैं। विवेक, पारस्परिक सम्मान और लचीलापन अपनाते हुए जैन समाज में एकता और सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।