विवरण
यह गीत दिखाता है कि एक भक्त कैसे दिव्य स्मरण में मोहित, आनंदित और मग्न हो जाता है, और परमात्मा के असाधारण गुणों की स्तुति करता है।
बोल
तारो नशो ज्यां छवाई गयो रे...
तारो नशो ज्यां छवाई गयो रे...
माया जे हती जगतनी वही गई रे...
तारो नशो ज्यां छवाई गयो रे...
भीनी सुगंध मनमां श्वसे
तो मारी इच्छा बहेकी ऊठे...
मनमंदिरे जो तुं वसे
तो मारुं होवुं महेकी ऊठे...
माया जे हती जगतनी वही गई रे...
तारो नशो ज्यां छवाई गयो रे...
हैयामां, लागणी एवी धबके छे
के चाहत जे मारी, तुजमां ज अटके छे
आंसुमां कही छे में मारी व्यथा तो
शब्दोमां हुं शुं बतावुं?
तारामां समाई छे मारी कथा तो
कागळ पर शुं लखावुं?
मारी ममता एषणा ने वासना
बधी विलाई गई...
माया जे हती जगतनी वही गई रे...
तारो नशो ज्यां छवाई गयो रे...
मजबूरी, तीणुं तीणुं चूभती’ती
तुं न हतो ए लाचारी, झीणुं झीणुं खूंचती’ती
थई दुनियानी मारी लेण-देण पूरी
अजब बनी मगरूरी
हवे ओळखी में जात सनूरी
वात न रही अधूरी
अहनिश निशदिन हरपळ हरदम
स्वर्ग वसावी लीधुं...
माया जे हती जगतनी वही गई रे...
तारो नशो ज्यां छवाई गयो रे...