विवरण
इस गीत का केंद्रीय भाव यह है कि भक्त अपने अंतर्मन में दिव्य कृपा के प्रवाह को अनुभव करता है — जो भावनात्मक शांति, आनंद और आध्यात्मिक जागृति लाता है। “कृपा तेरी…” पर बार-बार दिया गया जोर यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा ही हृदय को शांत, आनंदित और संतुष्ट बनाती है।
बोल
भंते! तारी प्रेमकथा छे अनन्य खरी
आह्लादक ने वात्सल्यना सारथी भरी × 2
चरणे हुं जे ढळ्यो, उन्नति ए रळ्यो
चमत्कृति आ केवी बनी!
करुं हुं गान, तुं छे महान!
कृपा तारी, मंडन मारुं,
सर्वस्व सघळुं तुंने धारुं × 2
कृपा तारी... कृपा तारी...
थोडी लालच नडी छे, थोडी भूलो पडी छे,
पण तुं स्वने जोडती कडी छे...
बोधनी अंजन-सळी छे, श्रद्धा सुमन कळी छे,
हैये ठंडक अजब वळी छे
लागणी ए मळी, ऋतुओ छ फळी
चमत्कृति आ केवी बनी!
करुं हुं गान, तुं छे महान!
कृपा तारी, मंडन मारुं,
सर्वस्व सघळुं तुंने धारुं × 2
कृपा तारी... कृपा तारी...
मोहनुं मर्दन कर्युं छे, मननुं मार्जन कर्युं छे
आत्मानुं दरिशन कर्युं छे...
सतनुं सर्जन थयुं छे, श्रीनुं अर्जन थयुं छे
दैन्य-विसर्जन थयुं छे
हाथ थामी चाह्यो, तुज करुणाए नाह्यो
चमत्कृति आ केवी बनी!
करुं हुं गान, तुं छे महान!
कृपा तारी, मंडन मारुं, सर्वस्व सघळुं तुंने धारुं × 2
कृपा तारी... कृपा तारी...
बस मारी एक याचना, सुणजो मारी प्रार्थना
राखो श्रीचरणमां मने, नहीं तरछोडशो तमे
तारा शरणमां हुं रमुं, देवाधिदेवने गमुं
जलधि आनंदनो जड्यो, हुं तमने आवी मळ्यो...