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लेख

चंदनबाला जैन मंदिर के विषय में मार्गदर्शन

बॉम्बे हाई कोर्ट ने १६ अप्रैल २०२६ को वालकेश्वर के चंदनबाला जैन मंदिर के मामले में एक आदेश पारित किया है, जिसके तहत अनधिकृत रसोई, विभाजन की दीवारों और स्टील गेट जैसे निर्माणों को अस्थायी (Interim) संरक्षण प्रदान किया गया है । हालांकि समाज में इसे "विजय" के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह केवल आगे की सुनवाई तक का अवसर है और यदि ये निर्माण अवैध पाए गए, तो महानगरपालिका को कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है । महाराष्ट्र रीजनल एंड टाउन प्लानिंग एक्ट, १९६૬ की धाराओं के तहत प्रशासन को किसी भी अवैध ढांचे को हटाने का अधिकार प्राप्त है, इसलिए सजग रहते हुए नियमितीकरण (Regularization) का मार्ग अपनाना ही विवेकपूर्ण है । यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि ट्रस्टी केवल संपत्ति के संरक्षक होते हैं और कोई भी निर्माण सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना नहीं होना चाहिए । अंततः, धर्म की सेवा वही है जो सत्य और विधि-सम्मत मार्ग पर चले, क्योंकि कानून की अनदेखी कर किया गया कोई भी कार्य जिनशासन की उज्ज्वल छवि को प्रभावित कर सकता है ।

शबरीमाला केस के विषय में मार्गदर्शन २०२६

शबरीमाला मामला व्यक्तिगत लैंगिक समानता और धार्मिक देवता के पारंपरिक अधिकारों के बीच संवैधानिक संतुलन की समीक्षा करता है। यह 2018 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले और मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी कानूनी चुनौतियों पर केंद्रित है। 2026 तक, यह मामला नौ न्यायाधीशों की पीठ के पास है जो धार्मिक परंपराओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को परिभाषित करेगी।

जानने की इच्छा और सत्य को पाने की लालसा प्रभु का वरदान है

सत्य को जानने और उसे आत्मसात करने की जिज्ञासा का हृदय में जागृत होना ईश्वर की महती कृपा और एक दुर्लभ वरदान का संकेत है। संसार की नश्वर वस्तुओं के बीच रहते हुए भी शाश्वत सत्य की खोज करने की प्रेरणा केवल वही आत्मा पाती है जिस पर परमात्मा का अनुग्रह होता है। यह पवित्र जिज्ञासा मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से बाहर निकालती है और आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पर अग्रसर कर आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है।

यदि हमारा लक्ष्य मोक्ष है, तो इसकी यात्रा की शुरुआत प्रश्न से होती है

यदि जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष है, तो इस आध्यात्मिक यात्रा का आरंभ स्वयं से और अस्तित्व से जुड़े गहरे प्रश्नों के माध्यम से होता है। ये प्रश्न ही वह शक्ति हैं जो साधक के भीतर सोई हुई चेतना को जगाते हैं और उसे अंधविश्वास से मुक्त कर सत्य के मार्ग पर ले जाते हैं। सही जिज्ञासा ही मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से विरक्त कर जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति पाने की दिशा में पहला ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करती है।

सफलता के पीछे हमारी दौड़ बिना किसी लक्ष्य के है

आज की सफलता की दौड़ अक्सर बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य या लक्ष्य के होती है, जहाँ हम केवल दूसरों से आगे निकलने की होड़ में लगे रहते हैं। इस अंधी दौड़ में हम यह भूल जाते हैं कि वास्तविक सफलता का अर्थ केवल ऊँचे पद या धन की प्राप्ति नहीं, बल्कि जीवन में सार्थकता और मानसिक संतोष पाना है। जब तक हमारी दौड़ के पीछे कोई नेक इरादा या मानवतावादी लक्ष्य नहीं होगा, तब तक हम अपनी उपलब्धियों के बावजूद स्वयं को भीतर से रिक्त और दिशाहीन ही पाएंगे।